*⌛दैनिक समायकी*⏳
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*मालदीव में यामीन पर सख्त कार्रवाई करे भारत*
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*(वेदप्रताप वैदिक)*
*(भारतीय विदेश नीति* *परिषद के अध्यक्ष)*
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मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन किसी की नहीं सुन रहे हैं। उनसे संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा और श्रीलंका ने अनुरोध किया है कि वे अपने संविधान और सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान करें। मालदीव के सबसे बड़े पड़ोसी और शुभेच्छु राष्ट्र भारत के अनुरोध को वे ठुकरा चुके हैं। मालदीव के सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से यह फैसला दिया था कि जिन 12 सांसदों को संसद से निकाल दिया गया था, उन्हें वापस लिया जाए और विरोधी दलों के नौ नेताओं को रिहा किया जाए। इनमें मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद और यामीन के अपने एक उपराष्ट्रपति भी हैं।
यह फैसला मानने की बजाय यामीन ने मालदीव में आपातकाल लगा दिया। अब उनका बर्ताव किसी निरंकुश तानाशाह जैसा हो गया है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद और एक न्यायाधीश अली हमीद को गिरफ्तार कर लिया है। सईद के वकील ने आरोप लगाया है कि सईद से यह कहा गया है कि यदि वे फैसला वापस नहीं लेंगे तो उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएंगे। डर के मारे शेष तीन जजों ने वह फैसला रद्द कर दिया है। यदि सांसदों और नेताओं की वापसी हो जाती तो यामीन की गद्दी हिल जाती। चुनाव तो साल भर बाद है लेकिन, यामीन को अभी ही गद्दी छोड़नी पड़ती, क्योंकि 85 सदस्यीय संसद में इन 12 सांसदों के विरोध के कारण उनकी पार्टी अल्पमत में आ जाती और यदि उन पर महाभियोग चलता तो उनके हारने की नौबत आ जाती। पूर्व राष्ट्रपति नशीद को 2015 में 13 साल के लिए जेल में डाल दिया गया था। लेकिन, इलाज के बहाने नशीद लंदन चले गए और अब यामीन के खिलाफ जबर्दस्त अभियान छेड़े हुए हैं।
यदि नशीद और शेष आठ नेता मुक्त होकर आज मालदीव में राजनीति करें तो यामीन का जीना मुश्किल हो सकता है। नशीद ने यामीन-सरकार के भ्रष्टाचार के ऐसे आंकड़े पेश किए हैं, जिनका तथ्यपूर्ण खंडन अभी तक नहीं किया जा सका है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि नशीद का साथ दे रहे हैं 80 वर्षीय मौमून गय्यूम, जो कि यामीन के सौतेले भाई हैं और जिन्होंने 30 साल तक राष्ट्रपति के रुप में मालदीव पर राज किया है। पूर्व राष्ट्रपति नशीद और गय्यूम, दोनों के साथ दिल्ली में मेरी व्यक्तिगत भेंट और लंबी वार्ता हुई है। दोनों ही भारत के अभिन्न मित्र हैं। यामीन ने इतनी क्रूरता दिखाई है कि 80 वर्षीय गय्यूम को भी जेल में डाल दिया है।
मालदीव की संसद के अध्यक्ष और यामीन के एक मंत्री ने तंग आकर इस्तीफा दे दिया है। खुद यामीन इतने बौखलाए हुए हैं कि उन्होंने पहले दो दिन में अपने दो पुलिस मुखियाओं को बर्खास्त कर दिया। अब उन्होंने अपने तीन परम मित्र राष्ट्रों- चीन, पाकिस्तान और सऊदी अरब को अपने विशेष दूत भिजवाए हैं। भारत ने उनके विशेष दूत को दिल्ली आने की अनुमति नहीं दी है। इस समय चीन खुलकर यामीन का समर्थन कर रहा है। उसने घुमा-फिराकर भारत को धमकी भी दी है कि मालदीव में बाहरी हस्तक्षेप अनुचित होगा। मालदीव भारत का पड़ोसी है और दक्षेस का सदस्य है लेकिन, ऐसा लग रहा है कि वह चीन का प्रदेश-सा बनता जा रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग तो 2014 में ही मालदीव जा चुके हैं। हमारे प्रधानमंत्री बाकी सारे पड़ोसी देशों में हो आए, पाकिस्तान भी, लेकिन अभी तक मालदीव नहीं जा सके।
मालदीव ने अभी-अभी चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता कर लिया है। 777 पृष्ठ के इस समझौते को संसद ने सिर्फ 10 मिनिट में बिना बहस हरी झंडी दे दी। 85 सदस्यीय संसद में सिर्फ 30 वोटों से उसे पास कर दिया गया। बिल्कुल इसी तरह जुलाई 2015 में संसद ने एक ऐसा कानून आनन-फानन बना दिया, जिसके तहत कोई भी विदेशी सरकार या व्यक्ति मालदीव के द्वीपों को खरीद सकता था। ये दोनों सुविधाएं चीन के लिए की गई हैं ताकि वह वहां अपना सैनिक अड्डा बना सके। राष्ट्रपति शी की मालदीव-यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने 8 समझौते किए थे। सबसे बड़ा समझौता इब्राहिम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाने का था। इस हवाई अड्डे को पहले एक भारतीय कंपनी बना रही थी। उसे रद्द करके यह चीन को दे दिया गया। माले और उससे 10 किमी दूर समुद्र में स्थित द्वीप हुलहुले के बीच चीन अब एक पुल बनाएगा। मालदीव चीन के रेशम महापथ की योजना में सक्रिय हिस्सा लेगा। इसके अलावा चीन ने वहां सड़कें और मकान बनाने की योजनाएं भी शुरू कर दी हैं। गत वर्ष मालदीव पहुंचने वाले पर्यटकों में 90 प्रतिशत चीनी थे। मालदीव आजकल इस्लामी कट्टरवाद का अड्डा भी बनता जा रहा है। उसके सैकड़ों युवक आजकल सीरिया में छापामारी कर रहे हैं। पिछले तीन-चार महीनों में मैं कई बार लिख चुका हूं कि मालदीव में भारत-विरोधी लहर उठने वाली है। पिछले माह जब हमारे विदेश मंत्रालय की नींद खुली तो उसने मालदीव के वि
देश मंत्री मोहम्मद असीम को भारत बुलवाया। उन्होंने सरकार परस्त एक मालदीवी अखबार के इस कथन का खंडन किया कि 'मालदीव का सबसे बड़ा दुश्मन भारत है और सबसे बड़ा दोस्त चीन है।' उसने भारत के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते की बात कही। मैंने लिखा था कि यह सिर्फ जबानी जमा-खर्च है।
अब भारत क्या करे? यदि अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण विरोधी नेताओं को यामीन रिहा कर दें, उनमें सर्वसम्मति करवाएं और चुनावों की घोषणा कर दें तो भारत को कुछ करने की जरूरत नहीं है लेकिन, यदि वे तानाशाही रवैया जारी रखेंगे तो मालदीव में अराजकता फैल सकती है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा। भारत ने यदि 1988 में सैन्य-हस्तक्षेप नहीं किया होता तो सिंगापुर और श्रीलंका से आए हुए हुड़दंगी मालदीव में राष्ट्रपति गय्यूम का तख्ता पलट देते। 1971 में श्रीलंका की प्रधानमंत्री सिरिमाओ भंडारनायक के अनुरोध पर भारत ने सेना भेजकर उन्हें बचाया था। नेपाल के राजा त्रिभुवन की भी 1950 में भारत ने रक्षा की थी। 1971 में शेख मुजीब के निमंत्रण पर भारत ने सेना भेजकर बांग्लादेश का निर्माण करवाया था। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति नशीद तथा अन्य महत्वपूर्ण नेताओं ने इस संकट की घड़ी में भारत से मदद मांगी है। भारत को अपने लिए कुछ नहीं चाहिए लेकिन, इस चार लाख लोगों के देश में खून की नदियों को बहने से रोकना उसका कर्तव्य है। (dainik bhaskar)
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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*⏳बांग्लादेश की सियासी दिशा*⏳
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*(अभिषेक रंजन सिंह)*
बांग्लादेश में इस साल के अंत में आम चुनाव (जातीय संसद) होने हैं। वहां होने वाले इस चुनाव के कई मायने हैं। मसलन बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी की तरफ से एलान किया गया था कि वे देश में होने वाले चुनाव में हिस्सा लेंगी। 2014 में हुए चुनाव में बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी ने स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से चुनाव नहीं कराने की वजह से इसका बहिष्कार किया था। उनकी मांग थी कि अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की निगारानी में वहां चुनाव कराए जाएं, लेकिन अवामी लीग की अध्यक्ष और प्रधानमंत्री शेख हसीना ने उनकी मांगों को खारिज कर दिया। उनका कहना था कि अपने संभावित हार की वजह से बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी चुनाव का बहिष्कार कर रही हैं। विपक्षी दलों के चुनाव बहिष्कार की वजह से अवामी लीग और उसके सहयोगी दलों को संसद की कुल 350 सीटों में से करीब डेढ़ सौ सीटों पर बगैर किसी चुनौती के जीत हासिल हुई थी।
हालांकि इस साल दिसंबर में होने वाले चुनाव में शामिल होना बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी की मजबूरी भी है। क्योंकि बांग्लादेश के संविधान के मुताबिक कोई राजनीतिक दल लगातार दो चुनावों का बहिष्कार करता है तो उसकी मान्यता खत्म हो सकती है। जमात-ए-इस्लामी इस बार चुनाव में हिस्सा लेने की बात कह रही है, लेकिन शीर्ष अदालत द्वारा उनके चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाई जा सकती है। क्योंकि उनके खिलाफ 1971 के युद्ध अपराध का मामला अभी भी चल रहा है। पार्टी के शीर्ष नेता मोतिउर निजामी समेत कई बड़े नेताओं को अदालती आदेश के बाद फांसी की सजा दी जा चुकी है। जबकि कई नेताओं पर फैसला आना बाकी है। अब चुनाव से पहले पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी प्रमुख खालिदा जिया को भ्रष्टाचार के आरोप में ढाका की एक विशेष अदालत ने दोषी मानते हुए पांच वर्ष की सजा सुनाई है। इससे बीएनपी के चुनाव लड़ने के मंसूबे को आघात लगा है।
भ्रष्टाचार के आरोप साबित होने के बाद बेगम खालिदा जिया को चुनाव के लिए अयोग्य ठहरा दिया गया है। वहीं इस मामले में उनके बड़े बेटे और बीएनपी के उपाध्यक्ष तारिक रहमान समेत चार लोगों को दस-दस वर्षो की सजा सुनाई गई है। हालांकि बीएनपी स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य और पूर्व उप प्रधानमंत्री मौदूद अहमद ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कही है, लेकिन बांग्लादेश के कानूनी जानकारों के मुताबिक ऊपरी अदालत से बेगम खालिदा जिया और उनके बेटे को राहत मिलने की गुंजाइश काफी कम है। दरअसल, यह मामला जिया यतीमखाना ट्रस्ट को विदेशी अनुदान में मिले 2.1 करोड़ टका यानी एक करोड़ 61 लाख रुपये के गबन से जुड़ा है। अदालत के इस फैसले से राजधानी ढाका समेत देश के दूसरे हिस्सों में काफी तनाव बढ़ गया है। ढाका के तोपखाना रोड और पलटन इलाके में कई जगहों पर हिंसा भी हुई है। वैसे यह सही है कि बांग्लादेश में अवामी लीग सरकार के खिलाफ भी लोगों में नाराजगी है, लेकिन कोई राजनीतिक विकल्प न होने की वजह से प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता पर फिलहाल कोई खतरा नहीं है।
अगर आप बांग्लादेश जाएं तो वहां पाएंगे कि जितने भी चौक-चौराहे हैं वहां बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के पक्ष में शायद ही कोई पोस्टर या हॉर्डिग दिखे। बांग्लादेश की राजनीति में दो बेगमों शेख हसीना और खालिदा जिया की सियासी अदावत काफी पुरानी है। बीएनपी और अवामी लीग के बीच कई मुद्दों पर गहरे मतभेद हैं। बीएनपी जहां बांग्लादेश को इस्लामिक राष्ट्र घोषित करने की मांग करती रही है वहीं अवामी लीग इसके सख्त खिलाफ रही है। उसका कहना है कि यह संविधान के खिलाफ है। खालिदा जिया जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थीं उस दौरान ईश निंदा कानून बनाने की मांग को लेकर ढाका समेत कई जिलों में भीषण हिंसा हुई थी जिसमें सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी। बीएनपी का आरोप यह भी रहा है कि अवामी लीग बांग्लादेश में हिंदू तुष्टिकरण की राजनीति करती है। साल 2014 के आम चुनाव में 18 हिंदू सांसद चुने गए थे। पिछले कई वर्षो के मुकाबले यह संख्या अधिक है। एक सरकारी आदेश के बाद पिछले दो वर्षो से बांग्लादेश के संसद में सरस्वती पूजा का भी आयोजन कराया जा रहा है। इसमें प्रधानमंत्री शेख हसीना समेत कई सांसदों और मंत्रियों ने हिस्सा लिया था। बीएनपी को हसीना सरकार का यह फैसला रास नहीं आया। नतीजतन इसके खिलाफ ढाका में कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन भी हुए। अवामी लीग सरकार हिंदुओं के कई महत्वपूर्ण त्योहारों को सरकारी अवकाश की सूची में शामिल कराया। बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी करीब बारह फीसद है जिसे अमूमन अवामी लीग का वोटबैंक समझा जाता है। यह बात सही भी है। खुद वहां रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदू स्वयं को इस सरकार में ज्यादा महफूज महसूस करते हैं।
बांग्लादेश में उर्दू भाषी मुसलमानों की संख्या करीब बीस लाख है। विभाजन के समय ये बिहार और पूर्वी उत्
तर प्रदेश से आकर बसे थे। 1971 के मुक्ति युद्ध के समय उर्दू भाषी मुसलमानों ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया था। बांग्लादेश बनने के बाद बंगाली मुसलमानों का कहर इन पर टूटा। नतीजतन इन्हें अपने घरों से बाहर आज भी कैंपों में रहना पड़ रहा है। काफी लंबी कानूनी लड़ाई के बाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद साल 2008 में इन्हें बांग्लादेशी नागिरक और वोटिंग का अधिकार मिला। उर्दू भाषी मुसलमानों को बीएनपी का सर्मथक माना जाता है। बहरहाल, बेगम खालिदा जिया को पांच साल की कैद और उनके चुनाव लड़ने पर पाबंदी के बाद इतना तय है कि दिसंबर में होने वाले चुनाव में शेख हसीना और उनकी पार्टी अवामी लीग की चुनावी राह और आसान हो गई है। भारत के लिए भी इसके काफी मायने हैं, क्योंकि अवामी लीग जब भी सत्ता में रही है दोनों देशों के संबंध काफी प्रगाढ़ हुए हैं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बहुप्रतीक्षित भूमि सीमा समझौता (एलबीए) हुआ, जिसमें दोनों देशों ने अपनी मर्जी से अपने भू-भाग का आदान-प्रदान किया था। इसके बाद दोनों देशों के करीब पचास हजार लोगों को दशकों बाद अपने देशों की नागरिकता हासिल हुई। (दैनिक जागरण से साभार )
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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*⏳ईरानी महिलाओं की हिजाब के खिलाफ साहसिक लड़ाई*⌛
*(तसलीमा नसरीन)*
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बीते 27 दिसंबर को विदा मोवाहेदी नामक 31 वर्षीय एक युवती ने तेहरान में सड़क किनारे यूटिलिटी बॉक्स पर चढ़कर एक छड़ी पर हिजाब को बांधकर झंडे की तरह लहराया था। इस विरोध के लिए उसे जेल में बंद कर दिया गया। कुछ दिन वह बाद जेल से रिहा हुई। मोवाहेदी के इस शांतिपूर्ण हिजाब विरोध के बाद ईरान में और भी कई लड़कियां और महिलाएं यूटिलिटी बॉक्स या फिर अन्य किसी ऊंचे स्थान पर चढ़कर डंडे या पेड़ की डाल में हिजाब को झंडे की तरह बांधकर लहरा रही हैं।
करीब 40 वर्षो से इस देश में महिलाओं के लिए हिजाब आवश्यक है। आप महिला हैं और घर से बाहर जाएंगी, अच्छी बात है, लेकिन आपको सिर ढककर बाहर जाना होगा। इसमें किसी तरह की कोताही नहीं होनी चाहिए। सिर के बाल से लेकर पैर के नाखून तक इस तरह ढककर रखना होगा कि कोई दूसरा व्यक्ति न देख सके। इस्लामिक नेताओं ने जब इस प्रथा की शुरुआत की थी तो इसका पूरे ईरान में व्यापक विरोध हुआ था, परंतु विरोध विफल हो गया और महिलाओं को सिर ढककर निकलने के लिए बाध्य होना पड़ा। आज सभी ईरानी लड़कियां भीड़ के बीच सड़क पर चलते हुए अचानक सिर से हिजाब नहीं हटा रही हैं, लेकिन अंदर-अंदर विरोध काफी वर्षो से चल रहा है।
2014 में मासिह एलिनेजाड नामक प्रवासी ईरानी पत्रकार ने फेसबुक पेज तैयार किया था, जिसका नाम रखा था ‘मेरी गुप्त स्वाधीनता’। उक्त पेज के जरिये उन्होंने अपील की थी कि लड़कियां ईरान के रास्ते-घाट, दुकान-बाजार, भीड़भाड़ वाले स्थानों पर खड़े होकर अपना हिजाब खोलें और फोटो खींचकर उसे उक्त& पेज पर पोस्ट करें। पिछले वर्ष मासिह एलिनेजाड ने एक और आंदोलन शुरू किया, जिसका नाम रखा ‘सफेद बुधवार’। इस बार उन्होंने महिलाओं को अनिवार्य रूप से सफेद रंग के हिजाब पहनने के कानून के खिलाफ एक आंदोलन खड़ा करने के लिए आमंत्रित किया।
संभवत: विदा मोवाहेदी और मासिह एलिनेजाड से प्रेरित होकर ही कई लड़कियों ने बुधवार 27 दिसंबर को सफेद हिजाब लहराया था। 2009 में ईरान छोड़ने से पहले मासिह एलिनेजाड पत्रकारिता करती थीं। उन्होंने बिना हिजाब के गाड़ी चलाते हुए एक फोटो भी फेसबुक पर पोस्ट की थी। उस समय उन्होंने महिलाओं से अपील की थी कि इसी तरह से वे भी अपनी फोटो फेसबुक पर पोस्ट करें। अनिवार्य हिजाब के खिलाफ आंदोलन की मुख्य बातें कुछ यूं हैं-यह हमारा शरीर है, इस शरीर को ढकने के लिए हम कैसी पोशाक पहनेंगे या नहीं पहनेंगे, यह फैसला हम स्वयं लेंगे, कोई और नहीं। हालांकि महिला आंदोलनकारी यह नहीं कह रहीं कि महिलाओं के लिए हिजाब उचित नहीं है। वे सिर्फ उसे अनिवार्य करने का विरोध कर रही हैं। उनका मानना है कि जिनकी इच्छा होगी वे हिजाब पहनेंगी और जिनकी नहीं होगी वे नहीं पहनेंगी।
यह मांग नई नहीं है, परंतु ईरान की सरकार महिलाओं को अपनी पसंद के कपड़े पहनने के अधिकार को स्वीकृति नहीं देना चाहती। दशकों पहले ईरान के सम्राट शाह पहलवी ने हिजाब को प्रतिबंधित कर दिया था। यह क्रांतिकारी कानून नहीं था, क्योंकि जो महिलाएं हिजाब के बिना बाहर नहीं जाना चाहती थीं उन्हें भी इसे मानना पड़ रहा था। वे मानती थीं कि हिजाब पहनने का उनका जो अधिकार है उसका हनन हो रहा है। कई महिलाएं इसी वजह से घरों से बाहर नहीं निकलती थीं। इसके बाद सियासी बदलाव हुआ और हिजाब को अनिवार्य कर दिया गया। ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खोमैनी ने 1979 में हिजाब को अनिवार्य किया था।
महिलाओं की पोशाक और उनके सिर के बालों को लेकर पुरुष राजनेता इतने ज्यादा चिंतित रहते हैं कि सवाल उठता है कि क्या महिलाओं का शरीर पुरुषों की संपत्ति है? अधिकांश पुरुष हमेशा से ही महिलाओं को निजी संपत्ति समझते आए हैं। आज के युग में भी इस सोच के खत्म होने का कोई लक्षण नहीं दिख रहा।11979 में हिजाब को अनिवार्य करने के खिलाफ महिलाएं सड़क पर उतरी थीं, पर जीत नही पाई थीं। हिजाब के समर्थन में लोग तब नारे लगाते थे,‘या तो हिजाब पहनो, नहीं तो मरने को तैयार रहो।’ हिजाब के कारण ईरान की ढेरों जागरूक महिलाएं गिरफ्तार हुईं और आज भी हो रही हैं। अकेले 2014 में पुलिस के पास महिलाओं के ठीक तरीके से हिजाब नहीं पहनने के 36 लाख मामले आए थे। 2006 में ईरानी नारीवादियों ने अपने समर्थन में 10 लाख हस्ताक्षर जुटाए थे और सरकार से नारी विरोधी कानूनों को निरस्त करने का अनुरोध किया था, लेकिन सरकार ने कोई कानून निरस्त नहीं किया।
उस आंदोलन के विफल होने से यही साबित हुआ कि महिलाओं की आजादी के लिए इस तरह के आंदोलन का ईरान में सफल होना संभव नहीं है। शायद इसीलिए मासिह एलिनेजाड एवं उनकी उम्र की युवतियां नए तरह का आंदोलन करना चाहती हैं। अब उन्होंने महिलाओं के सिर के हिजाब को अत्याचार के प्रतीक के तौर पर आंदोलन करने के लिए चुन लिया है। वे कहती हैं, ‘हम कपड़े के एक टुकड़े के खि
लाफ नहीं लड़ रहे हैं। हम अपने सम्मान के लिए लड़ रहे हैं। हमें अपने सिर पर क्या पहनना है, अगर यह फैसला करने नहीं दिया जाएगा तो हमारे माथे के अंदर जो बुद्धि है, उसका मालिकाना भी हमें नहीं दिया जाएगा।’
इन दिनों पूरे ईरान में हिजाब विरोधी आंदोलन चल रहा है, यह देखकर देश के राष्ट्रपति ने कहा है, ‘ठीक ही तो है, तुम अपनी पसंद-नापसंद भावी पीढ़ी पर जबरन नहीं थोप सकते।’ क्या सरकार थोड़ी नरम हो रही है? यदि नरम हो रही है तो इसका मतलब है कि महिलाओं का यह आंदोलन सफलता का मुंह देख रहा है। एलिनेजाड ने कहा है, ‘पहले महिलाएं सरकार से डरती थीं, अब सरकार महिलाओं से डर रही है।’ हो सकता है एलिनेजाड अति आशावादी हों, क्योंकि अब तक 29 महिलाओं को हिजाब विरोधी आंदोलन के अपराध में ईरानी पुलिस पकड़कर ले गई है। मुङो नहीं लगता कि ईरानी महिलाएं अपने अधिकार इतनी आसानी से पाएंगी, लेकिन वे जिस तरह के साहस का परिचय दे रही हैं वह कम नहीं है। साहस ही साहस को जन्म देता है। इससे और भी महिलाएं प्रेरित हो रही हैं और हिजाब खोलकर फेंक रही हैं।
इस आंदोलन को सिर्फईरान में नहीं, पूरी दुनिया में प्रशंसा मिली है। उन्हें यह आंदोलन जारी रखना होगा, जब तक उन्हें हिजाब नहीं पहनने का अधिकार नहीं मिल जाता। हालांकि यह नहीं हो सकता कि इस्लामिक कानून भी रहे और महिलाओं की आजादी भी। कारण यह कि दोनों परस्पर विरोधी हैं। क्या मुसलमानों के लिए इस्लाम के मानवीय पक्ष पर यकीन रखकर समाज को समता के समाज के हिसाब से गढ़ना संभव नहीं है? संभव है, बस इसके लिए महिलाओं को दासी अथवा यौन की चीज के बजाय एक संपूर्ण एवं सक्षम मनुष्य के तौर पर चिन्हित करना होगा। राष्ट्र को धर्म से अलग रखकर सभ्य कानून बहाल करके सभ्य समाज बनाने के लिए एक न एक दिन स्त्री-पुरुष, दोनों को कदम उठाने ही होंगे। बस यह यकीन बना रहे कि चाहने से सब संभव है।(दैनिक जागरण से साभार )
(लेखिका जानी-मानी साहित्यकार हैं)
*दैनिक समसामयिकी*
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*10 February 2018(Saturday)*
1.नीति आयोग ने विश्व बैंक और स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर स्वास्थ्य सूचकांक तैयार किया
• नीति आयोग ने विश्व बैंक और स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर स्वास्थ्य सूचकांक तैयार किया है जिसे आज जारी किया गया।
• सूचकांक में बड़े राज्यों में 76.55 अंक के साथ केरल पहले और 33.69 अंक के साथ उत्तर प्रदेश अंतिम स्थान पर है। दिल्ली 50.00 अंक के साथ तीसरे स्थान पर रहा।
• छोटे राज्यों में मिजोरम 73.70 अंक के साथ पहले और नगालैंड 37.38 अंक के साथ आखिरी स्थान पर तथा केंद्रशासित प्रदेशों में 65.79 अंक के साथ लक्षद्वीप शीर्ष पर और दादर एवं नागर हवेली 34.64 अंक के साथ सबसे नीचे है।
• सूचकांक तय करने के लिए राज्यों का आकलन बाल मृत्यु दर, पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर, टीकाकरण की व्यापकता, घर की बजाय अस्पतालों में बच्चों का जन्म तथा एचआईवी के रोगियों की संख्या आदि को आधार बनाया गया है।
• सालाना वृद्धिकारी निष्पादन के लिहाज से झारखंड, जम्मू- कश्मीर व उत्तर प्रदेश शीर्ष के तीन राज्यों मंअ से हैं। इन राज्यों ने नवजात मृत्यु दर, पांच साल से कम के शिशुओं की मृत्यु दर, पूर्ण टीकाकरण तथा संस्थागत प्रसव के मामले में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया।
• नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत ने यह रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, सरकारी शोध संस्थान का मानना है कि स्वास्थ्य सूचकांक सरकार व सहकारिता संघवाद के इस्तेमाल के उपकरण के रूप में काम करेगा। छोटे राज्यों में रैंकिंग के मामले में मणिपुर दूसरे और मेघालय तीसरे स्थान पर हैं। वहीं सुधार के मामले में मणिपुर पहले, गोवा दूसरे और मेघालय तीसरे स्थान पर है।
• केंद्र शासित प्रदेशों में लक्षद्वीप के बाद चंडीगढ़ दूसरे और दिल्ली तीसरे स्थान पर है। सुधार के मामले में भी लक्षद्वीप पहले, अंडमान निकोबार दूसरे और दादर एवं नागर हवेली तीसरे स्थान पर हैं।
• रिपोर्ट में कहा गया है हालांकि भारत ने जीवन प्रत्याशा बढ़ाने और शिशु एवं मातृ मृत्यु दर कम करने के मामले में काफी प्रगति की है लेकिन एक राष्ट्र के रूप में सुधार की हमारी दर अपर्याप्त है।
• नीति आयोग ने कहा है कि उसका फोकस बदलाव को गति देने और उन राज्यों को रेखांकित करना है जिन्होंने सबसे ज्यादा सुधार किया है।
• सुधार का आकलन वर्ष 2014-15 की तुलना में 2015-16 के प्रदर्शन से किया गया है। यह रिपोर्ट स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ मिलकर तैयार की गयी है।
2. मालदीव को लेकर भारत से विवाद नहीं चाहता चीन
• मालदीव में जारी राजनीतिक उथल-पुथल के समाधान का रास्ता निकालने के लिए चीन निरंतर भारत के संपर्क में है। चीन का कहना है कि वह नहीं चाहता कि यह मुद्दा भारत के साथ उसके संबंधों में विवाद का एक और विषय बने।
• अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच टेलीफोन पर लंबी बातचीत और मालदीव में विशेष भारतीय सुरक्षा बलों की तैनाती की खबरों के बीच चीन का कहना है कि मालदीव में कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
• चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने शुक्रवार को कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मालदीव की संप्रभुता और स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। मालदीव की वर्तमान स्थिति उनका आंतरिक मामला है। सभी संबंधित पक्षों को इसका आपसी बातचीत व सलाह-मशविरे से समाधान करना चाहिए।
• मालदीव के आर्थिक विकास मंत्री मोहम्मद सईद और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच मुलाकात का जिक्र करते हुए शुआंग ने कहा कि चीन ने मालदीव के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने का भरोसा दिया है। जब उनसे पूछा गया कि मालदीव अपनी समस्या का समाधान अकेले कैसे कर पाएगा जबकि यामीन सरकार ने शीर्ष न्यायाधीशों और नेताओं को ही बंदी बना लिया है। इस पर चीनी प्रवक्ता ने कहा कि यह सवाल तो मालदीव सरकार से पूछा जाना चाहिए।
• क्या मोहम्मद सईद ने चीन से मदद मांगी है? इस पर शुआंग ने कहा कि दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध बिल्कुल ठीक हैं और दोनों के बीच सामान्य व दोस्ताना बातचीत होती है।
• मालूम हो कि डोकलाम में तनातनी और मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने की राह में बीजिंग के रोड़ा अटकाने की वजह से भारत-चीन संबंधों में पहले से ही खटास है।
3. सुरक्षा व आर्थिक संबंध बढ़ाएंगे मोदी-ट्रंप
• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सुरक्षा और आर्थिक सहयोग को मजबूत करने के साथ ही हिंद-प्रशांत में साझेदारी को लेकर प्रतिबद्धता जताई है।
• व्हाइट हाउस से जारी बयान के मुताबिक, ‘‘द्विपक्षीय सहयोग पर बृहस्पतिवार को टेलीफोन वार्ता के दौरान, दोनों नेताओं ने रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण और विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की क्रमश: अमेरिकी रक्षामंत्री जिम मैटिस और व
िदेशमंत्री रेक्स टिलरसन के साथ टू प्लस टू स्तर की बैठक के बारे में र्चचा की।’
• बयान के अनुसार, ‘‘दोनों नेताओं ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा और समृद्धि बढ़ाने के लिए लगातार सुरक्षा और समृद्धि बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई।’
• राष्ट्रपति ट्रंप की दक्षिण एशिया नीति की पुष्टि करते हुए उन लोगों ने अफगानिस्तान में सुरक्षा और स्थिरता के लिए समर्थन की प्रतिबद्धता दोहराई।’ दोनों नेताओं ने मालदीव में राजनीतिक संकट पर भी चिंता जताई और लोकतांत्रिक संस्थान व कानून के शासन के आदर की महत्ता पर जोर दिया। ‘‘दोनों नेताओं ने म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थियों के संकट को सुलझाने के तरीकों और देश की स्थिति पर भी बात की।’
• अमेरिकी विदेश नीति की शीर्ष प्राथमिकता, उत्तर कोरिया के मुद्दे पर भी दोनों नेताओं ने प्योंगयांग के परमाणु निशस्त्रीकरण के लिए अन्य कदम उठाने के बारे में र्चचा की।’
• चीन मालदीव में उपजे राजनीतिक संकट के बीच वहां के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन को समर्थन दे रहा है, वहीं नई दिल्ली और वाशिंगटन इस मुद्दे पर समान दृष्टिकोण अपना रहे हैं और दोनों देश यामीन द्वारा सोमवार को लागू आपातकाल को समाप्त करने व वहां लोकतंत्र की तत्काल बहाली चाहते हैं।
4. मूडीज ने दो बैंकों की रेटिंग बढ़ाई
• अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज ने शुक्रवार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों सेंट्रल बैंक आफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक (आईओबी) के लिए परिदृश्य को स्थिर से बढ़ाकर सकरात्मक कर दिया है। सरकार की ओर से बैंकों में पूंजी डालने के कारण रैकिंग में सुधार किया गया है।
• एजेंसी ने दोनों बैंकों की दीर्घकालिक स्थानीय तथा विदेशी मुद्रा जमा की रेंिटंग को बीए3 पर रखने की पुष्टि की। एजेंसी ने बैंकों के कर्ज आकलन (बीसीए) को बी3 पर और उसके प्रतिपक्ष जोखिम आकलन (सीआरए) ने बीए2 (सीआर) एनपी(सीआर) पर रखा है।
• सरकार के पुनर्पूंजीकरण योजना के तहत सेंट्रल बैंक को 5160 करोड़ रपए जबकि इंडियन ओवरसीज बैंक को 4,690 करोड़ रूपये की नई पूंजी सरकार से मिलेगी।
• मूडीज ने रिपोर्ट में कहा, सकरात्मक परिदृश्य यह दर्शाता है कि सरकार की ओर से अगले 12 से 18 महीने में डाली जाने वाली पूंजी के कारण बैंकों की पूंजीगत स्थिति में सुधार जारी रहेगा।
5. विदेशी मुद्रा भंडार रिकार्ड 420 अरब डालर के पार
• देश के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार आठवें सप्ताह वृद्धि दर्ज हुई है। दो फरवरी को समाप्त सप्ताह में यह 421.91 अरब डालर के अब तक के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया।यह पहली बार है जब विदेशी मुद्रा भंडार 420 अरब डालर के पार पहुंचा है।
• इससे पहले 26 जनवरी को समाप्त सप्ताह में यह तीन अरब डालर बढ़कर 417.79 अरब डालर पर रहा था। बीते सप्ताह में इसमें 4.13 अरब डालर की वृद्धि हुई जो दो महीने की सबसे बड़ी वृद्धि है।
• गत दो फरवरी को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने का प्रमुख कारण इसके सबसे बड़े घटक विदेशी मुद्रा परिसंपत्ति का 3.03 अरब डालर बढ़कर 396.77 अरब डालर पर पहुंचना रहा है।
• इसके साथ ही देश का स्वर्ण भंडार भी 1.09 अरब डालर की मजबूत बढ़ोतरी के साथ 21.51 अरब डालर के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया। आलोच्य सप्ताह में आईएमएफ के पास आरक्षित निधि बढ़कर 2.08 अरब डालर रही।
6. आयुष्मान भारत के लिए पहले साल 12 हजार करोड़
• 10 करोड़ परिवारों को पांच लाख रुपये का बीमा देने के लिए केंद्र सरकार को पहले साल 12 हजार करोड़ रुपये और दूसरे साल 22 हजार करोड़ रुपये का प्रीमियम देना होगा। प्रति परिवार को 1180 रुपये वार्षिक का प्रीमियम का अनुमान लगाया है।
• स्वास्थ्य सुरक्षा योजना में पहले साल सभी बीमारियों को नहीं जोड़ा जाएगा, लेकिन अगले साल योजना की समीक्षा कर उसका दायरा बढ़ाया जाएगा।बजट में घोषित आयुष्मान भारत योजना के तहत 10 करोड़ लोगों को पांच लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा दिया जाएगा। बजट में केवल दो हजार रुपये का प्रावधान किया गया है। योजना की विस्तृत रिपोर्ट नीति आयोग तैयार कर रहा है।
• नीति आयोग सूत्रों के अनुसार पहले साल करीब 1180 रुपये प्रति परिवार का प्रीमियम का खर्चा आयेगा। राजस्थान सरकार ने 350 रुपये के प्रीमियम में तीन लाख रुपये का बीमा उपलब्ध कराया है। अब यह प्रीमियम बढ़कर करीब 1200 रुपये हो गया है। पश्चिम बंगाल सरकार भी पांच रुपये का बीमा दे रही है।
• केंद्र सरकार ने पहले साल 10 करोड़ परिवारों का अनुमान लगया है कि लेकिन इसमें बढ़ोतरी होगी। क्योंकि बहुत से परिवार ऐसे हैं जो बीपीएल की श्रेणी मे नहीं आते हैं, लेकिन उनकी स्थिति बीपीएल के अच्छी नहीं है। आयोग का कहना है कि बीमाधारकों की संख्या करोड़ों में होने के कारण सरकार के पास बीमा कंपनियों और अस्पतालों के साथ बार्गेन करने की ताकत होगी।
• पहले चरण में बीमा कवरेज में सभी बीमारियों को शामिल नहीं किया जाएगा। पहले चरण के अनुभव के आधार पर दूसरे
चरण में बीमारियों की संख्या जोड़ी जाएगी। सरकार बीमारियों के हिसाब उनके रेट भी तय करेगी।
• सूत्रों का कहना है स्वास्थ्य सुरक्षा योजना का खर्च केंद्र सरकार और राज्यों के बीच 60:40 के अनुपात में उठाएगी। यदि कोई राज्य अपनी ही बीमा योजना चलाना चाहे तो वह स्वतंत्र होगा, जैसे कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और राजस्थान चला रहे हैं।
7. सुप्रीम कोर्ट ने दी देश में 19 ट्रिब्यूनल की नियुक्ति को हरी झंडी
• सुप्रीम कोर्ट ने कैट और एनजीटी सहित सभी 19 टिब्यूनल के अध्यक्ष, न्यायिक एवं अन्य सदस्यों की नियुक्ति का रास्ता साफ कर दिया। 2017 के वित्त अधिनियम और पैनल को प्रशासित करने वाले नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं के लंबित रहने के कारण नियुक्ति रुकी हुई थी।
• मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा शुक्रवार को दिए गए आदेश में टिब्यूनल पर नए कानून एवं नियमों पर रोक लगाई गई है।
• पीठ ने कहा है कि केंद्रीय प्रशासनिक टिब्यूनल (कैट), नेशनल ग्रीन टिब्यूनल (एनजीटी) और सशस्त्र बल टिब्यूनल (एएफटी) जैसे टिब्यूनल में पुराने नियमों में कुछ संशोधन के तहत नियुक्ति की जा सकेगी।
• लोगों के प्रदर्शन के अधिकार पर समग्र दृष्टि की जरूरत : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नागरिकों के प्रदर्शन के बुनियादी अधिकार के संरक्षण पर एक समग्र दृष्टि अपनाने की जरूरत है। दिल्ली में प्रदर्शन के लिए स्थान तय करने के मुद्दे पर शीर्ष अदालत ने सुनवाई की।
• पीठ ने कहा कि पर्यावरण और नियमित रूप से आने-जाने वाले लोगों के अधिकार के संरक्षण की भी जरूरत है। केंद्र सरकार ने शुक्रवार को शीर्ष अदालत से कुछ समय देने की मांग की।
8. पश्चिम बंगाल में आठवीं सरकारी भाषा बनी ‘कुरुख’
• पश्चिम बंगाल में आठवीं सरकारी भाषा के रूप में ‘कुरुख’ को स्वीकृति दे दी गई है। इसके लिए बंगाल भाषा कानून में संशोधन किया गया है। मुख्य रूप से उरांव और किशान संप्रदाय के लोग यह भाषा बोलते हैं।
• बंगाल में बांग्ला के अलावा उर्दू, हिंदी , नेपाली, सांउताली, ओडिया, अलचिकी और पंजाबी को सरकारी भाषा के रूप में मान्यता है। बंगाल के कुछ भागों में ‘कुरुख’ भाषा का प्रचलन है। ओडिशा, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, नेपाल व भूटान में भी इस भाषा को बोलने वाले लोग हैं।
• बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में भी लोग इस भाषा का प्रयोग करते हैं। बंगाल में करीब 16 लाख लोग ‘कुरुख’ भाषा बोलते हैं। पिछले वर्ष फरवरी में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘कुरुख’ को सरकारी भाषा के रूप में मान्यता देने की घोषणा की थी।
• उल्लेखनीय है कि बिहार की भोजपुरी और मैथिली भाषा को भी सरकारी भाषा की सूची में स्थान दिलाने की लंबे समय से मांग की जा रही है। इसे लेकर दलों और उनके नेताओं ने संसद के दोनों सदनों में तमाम बार आवाज उठाई है। पूर्ववर्ती सरकारों की ओर से समय-समय पर आश्वासन भी दिया गया लेकिन अभी तक कुछ ठोस नहीं किया गया है।
9. ‘‘जूनो’ ने बृहस्पति की 10वीं परिक्रमा पूरी की
• अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने कहा है कि अंतरिक्ष यान ‘‘जूनो’ ने बृहस्पति ग्रह की कक्षा में करीब से यात्रा करते हुए इस सप्ताह अपनी 10वीं परिक्रमा पूरी कर ली है।
• नासा ने बृहस्पतिवार को एक बयान में कहा कि जूनो सात फरवरी को प्रशांत महासागर के मानक समय अनुसार सात फरवरी को सुबह 6.36 बजे बृहस्पति के सबसे करीब था। बयान के अनुसार, परिक्रमा के दौरान जानकारी इकट्ठी कर रहा जूनो अब धरती पर लौट रहा है।
• पांच अगस्त, 2011 को प्रक्षेपित जूनो ने हाल ही में बृहस्पति के प्रसिद्ध तूफान ‘‘द ग्रेट रेड स्पॉट’ की गहराई का पता लगाया था। अंतरिक्ष यान चार जुलाई, 2016 को बृहस्पति की कक्षा में पहुंच गया था। अनुसंधान के समय जूनो बृहस्पति की धरती से लगभग 3400 किलोमीटर ऊपर बादलों के बराबर पहुंच गया था।
• जूनो परिक्रमा के दौरान बृहस्पति के चारों तरफ निर्मित बादलों के धुंधले आवरण के नीचे के वातावरण, ग्रह की उत्पत्ति, बनावट, वातावरण और उसके चुम्बकत्व के बारे में और अधिक जानने के लिए उसके सूर्योदय का अध्ययन कर रहा था।
10. आईसीसी की पहली महिला स्वतंत्र निदेशक होंगी नूयी
• पेप्सीको की चेयरमैन और सीईओ इंदिरा नूयी को आईसीसी की पहली स्वतंत्र महिला निदेशक नियुक्त किया गया। नूयी जून 2018 में बोर्ड से जुड़ेंगी।
• आईसीसी ने कहा, ‘‘इस भूमिका के लिए आईसीसी से जुड़ने वाली पहली महिला बनकर मैं रोमांचित हूं। बोर्ड, आईसीसी साझेदारों और क्रि केटरों के साथ काम करने का मुझे इंतजार है।’
• आईसीसी अध्यक्ष शशांक मनोहर ने कहा, ‘‘एक और स्वतंत्र निदेशक और वह भी महिला को नियुक्त करना देश के संचालन को बेहतर बनाने की दिशा में अहम कदम है।’ उनकी नियुक्ति दो साल के लिए की गई है लेकिन उन्हें दोबारा नियुक्त किया जा सकता है।
Source of the News
Dainik Bhaskar(Rashtriya Sanskaran), Rashtriya Sahara(Rashtriya Sanskaran) Hindustan dainik(Delhi), Nai Duniya, Hindustan Times, The Hindu, BBC Portal, The Economic Times(Hindi& English)
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*मालदीव में यामीन पर सख्त कार्रवाई करे भारत*
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*(वेदप्रताप वैदिक)*
*(भारतीय विदेश नीति* *परिषद के अध्यक्ष)*
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मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन किसी की नहीं सुन रहे हैं। उनसे संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा और श्रीलंका ने अनुरोध किया है कि वे अपने संविधान और सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान करें। मालदीव के सबसे बड़े पड़ोसी और शुभेच्छु राष्ट्र भारत के अनुरोध को वे ठुकरा चुके हैं। मालदीव के सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से यह फैसला दिया था कि जिन 12 सांसदों को संसद से निकाल दिया गया था, उन्हें वापस लिया जाए और विरोधी दलों के नौ नेताओं को रिहा किया जाए। इनमें मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद और यामीन के अपने एक उपराष्ट्रपति भी हैं।
यह फैसला मानने की बजाय यामीन ने मालदीव में आपातकाल लगा दिया। अब उनका बर्ताव किसी निरंकुश तानाशाह जैसा हो गया है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद और एक न्यायाधीश अली हमीद को गिरफ्तार कर लिया है। सईद के वकील ने आरोप लगाया है कि सईद से यह कहा गया है कि यदि वे फैसला वापस नहीं लेंगे तो उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएंगे। डर के मारे शेष तीन जजों ने वह फैसला रद्द कर दिया है। यदि सांसदों और नेताओं की वापसी हो जाती तो यामीन की गद्दी हिल जाती। चुनाव तो साल भर बाद है लेकिन, यामीन को अभी ही गद्दी छोड़नी पड़ती, क्योंकि 85 सदस्यीय संसद में इन 12 सांसदों के विरोध के कारण उनकी पार्टी अल्पमत में आ जाती और यदि उन पर महाभियोग चलता तो उनके हारने की नौबत आ जाती। पूर्व राष्ट्रपति नशीद को 2015 में 13 साल के लिए जेल में डाल दिया गया था। लेकिन, इलाज के बहाने नशीद लंदन चले गए और अब यामीन के खिलाफ जबर्दस्त अभियान छेड़े हुए हैं।
यदि नशीद और शेष आठ नेता मुक्त होकर आज मालदीव में राजनीति करें तो यामीन का जीना मुश्किल हो सकता है। नशीद ने यामीन-सरकार के भ्रष्टाचार के ऐसे आंकड़े पेश किए हैं, जिनका तथ्यपूर्ण खंडन अभी तक नहीं किया जा सका है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि नशीद का साथ दे रहे हैं 80 वर्षीय मौमून गय्यूम, जो कि यामीन के सौतेले भाई हैं और जिन्होंने 30 साल तक राष्ट्रपति के रुप में मालदीव पर राज किया है। पूर्व राष्ट्रपति नशीद और गय्यूम, दोनों के साथ दिल्ली में मेरी व्यक्तिगत भेंट और लंबी वार्ता हुई है। दोनों ही भारत के अभिन्न मित्र हैं। यामीन ने इतनी क्रूरता दिखाई है कि 80 वर्षीय गय्यूम को भी जेल में डाल दिया है।
मालदीव की संसद के अध्यक्ष और यामीन के एक मंत्री ने तंग आकर इस्तीफा दे दिया है। खुद यामीन इतने बौखलाए हुए हैं कि उन्होंने पहले दो दिन में अपने दो पुलिस मुखियाओं को बर्खास्त कर दिया। अब उन्होंने अपने तीन परम मित्र राष्ट्रों- चीन, पाकिस्तान और सऊदी अरब को अपने विशेष दूत भिजवाए हैं। भारत ने उनके विशेष दूत को दिल्ली आने की अनुमति नहीं दी है। इस समय चीन खुलकर यामीन का समर्थन कर रहा है। उसने घुमा-फिराकर भारत को धमकी भी दी है कि मालदीव में बाहरी हस्तक्षेप अनुचित होगा। मालदीव भारत का पड़ोसी है और दक्षेस का सदस्य है लेकिन, ऐसा लग रहा है कि वह चीन का प्रदेश-सा बनता जा रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग तो 2014 में ही मालदीव जा चुके हैं। हमारे प्रधानमंत्री बाकी सारे पड़ोसी देशों में हो आए, पाकिस्तान भी, लेकिन अभी तक मालदीव नहीं जा सके।
मालदीव ने अभी-अभी चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता कर लिया है। 777 पृष्ठ के इस समझौते को संसद ने सिर्फ 10 मिनिट में बिना बहस हरी झंडी दे दी। 85 सदस्यीय संसद में सिर्फ 30 वोटों से उसे पास कर दिया गया। बिल्कुल इसी तरह जुलाई 2015 में संसद ने एक ऐसा कानून आनन-फानन बना दिया, जिसके तहत कोई भी विदेशी सरकार या व्यक्ति मालदीव के द्वीपों को खरीद सकता था। ये दोनों सुविधाएं चीन के लिए की गई हैं ताकि वह वहां अपना सैनिक अड्डा बना सके। राष्ट्रपति शी की मालदीव-यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने 8 समझौते किए थे। सबसे बड़ा समझौता इब्राहिम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाने का था। इस हवाई अड्डे को पहले एक भारतीय कंपनी बना रही थी। उसे रद्द करके यह चीन को दे दिया गया। माले और उससे 10 किमी दूर समुद्र में स्थित द्वीप हुलहुले के बीच चीन अब एक पुल बनाएगा। मालदीव चीन के रेशम महापथ की योजना में सक्रिय हिस्सा लेगा। इसके अलावा चीन ने वहां सड़कें और मकान बनाने की योजनाएं भी शुरू कर दी हैं। गत वर्ष मालदीव पहुंचने वाले पर्यटकों में 90 प्रतिशत चीनी थे। मालदीव आजकल इस्लामी कट्टरवाद का अड्डा भी बनता जा रहा है। उसके सैकड़ों युवक आजकल सीरिया में छापामारी कर रहे हैं। पिछले तीन-चार महीनों में मैं कई बार लिख चुका हूं कि मालदीव में भारत-विरोधी लहर उठने वाली है। पिछले माह जब हमारे विदेश मंत्रालय की नींद खुली तो उसने मालदीव के वि
देश मंत्री मोहम्मद असीम को भारत बुलवाया। उन्होंने सरकार परस्त एक मालदीवी अखबार के इस कथन का खंडन किया कि 'मालदीव का सबसे बड़ा दुश्मन भारत है और सबसे बड़ा दोस्त चीन है।' उसने भारत के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते की बात कही। मैंने लिखा था कि यह सिर्फ जबानी जमा-खर्च है।
अब भारत क्या करे? यदि अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण विरोधी नेताओं को यामीन रिहा कर दें, उनमें सर्वसम्मति करवाएं और चुनावों की घोषणा कर दें तो भारत को कुछ करने की जरूरत नहीं है लेकिन, यदि वे तानाशाही रवैया जारी रखेंगे तो मालदीव में अराजकता फैल सकती है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा। भारत ने यदि 1988 में सैन्य-हस्तक्षेप नहीं किया होता तो सिंगापुर और श्रीलंका से आए हुए हुड़दंगी मालदीव में राष्ट्रपति गय्यूम का तख्ता पलट देते। 1971 में श्रीलंका की प्रधानमंत्री सिरिमाओ भंडारनायक के अनुरोध पर भारत ने सेना भेजकर उन्हें बचाया था। नेपाल के राजा त्रिभुवन की भी 1950 में भारत ने रक्षा की थी। 1971 में शेख मुजीब के निमंत्रण पर भारत ने सेना भेजकर बांग्लादेश का निर्माण करवाया था। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति नशीद तथा अन्य महत्वपूर्ण नेताओं ने इस संकट की घड़ी में भारत से मदद मांगी है। भारत को अपने लिए कुछ नहीं चाहिए लेकिन, इस चार लाख लोगों के देश में खून की नदियों को बहने से रोकना उसका कर्तव्य है। (dainik bhaskar)
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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*⏳बांग्लादेश की सियासी दिशा*⏳
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*(अभिषेक रंजन सिंह)*
बांग्लादेश में इस साल के अंत में आम चुनाव (जातीय संसद) होने हैं। वहां होने वाले इस चुनाव के कई मायने हैं। मसलन बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी की तरफ से एलान किया गया था कि वे देश में होने वाले चुनाव में हिस्सा लेंगी। 2014 में हुए चुनाव में बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी ने स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से चुनाव नहीं कराने की वजह से इसका बहिष्कार किया था। उनकी मांग थी कि अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की निगारानी में वहां चुनाव कराए जाएं, लेकिन अवामी लीग की अध्यक्ष और प्रधानमंत्री शेख हसीना ने उनकी मांगों को खारिज कर दिया। उनका कहना था कि अपने संभावित हार की वजह से बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी चुनाव का बहिष्कार कर रही हैं। विपक्षी दलों के चुनाव बहिष्कार की वजह से अवामी लीग और उसके सहयोगी दलों को संसद की कुल 350 सीटों में से करीब डेढ़ सौ सीटों पर बगैर किसी चुनौती के जीत हासिल हुई थी।
हालांकि इस साल दिसंबर में होने वाले चुनाव में शामिल होना बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी की मजबूरी भी है। क्योंकि बांग्लादेश के संविधान के मुताबिक कोई राजनीतिक दल लगातार दो चुनावों का बहिष्कार करता है तो उसकी मान्यता खत्म हो सकती है। जमात-ए-इस्लामी इस बार चुनाव में हिस्सा लेने की बात कह रही है, लेकिन शीर्ष अदालत द्वारा उनके चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाई जा सकती है। क्योंकि उनके खिलाफ 1971 के युद्ध अपराध का मामला अभी भी चल रहा है। पार्टी के शीर्ष नेता मोतिउर निजामी समेत कई बड़े नेताओं को अदालती आदेश के बाद फांसी की सजा दी जा चुकी है। जबकि कई नेताओं पर फैसला आना बाकी है। अब चुनाव से पहले पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी प्रमुख खालिदा जिया को भ्रष्टाचार के आरोप में ढाका की एक विशेष अदालत ने दोषी मानते हुए पांच वर्ष की सजा सुनाई है। इससे बीएनपी के चुनाव लड़ने के मंसूबे को आघात लगा है।
भ्रष्टाचार के आरोप साबित होने के बाद बेगम खालिदा जिया को चुनाव के लिए अयोग्य ठहरा दिया गया है। वहीं इस मामले में उनके बड़े बेटे और बीएनपी के उपाध्यक्ष तारिक रहमान समेत चार लोगों को दस-दस वर्षो की सजा सुनाई गई है। हालांकि बीएनपी स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य और पूर्व उप प्रधानमंत्री मौदूद अहमद ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कही है, लेकिन बांग्लादेश के कानूनी जानकारों के मुताबिक ऊपरी अदालत से बेगम खालिदा जिया और उनके बेटे को राहत मिलने की गुंजाइश काफी कम है। दरअसल, यह मामला जिया यतीमखाना ट्रस्ट को विदेशी अनुदान में मिले 2.1 करोड़ टका यानी एक करोड़ 61 लाख रुपये के गबन से जुड़ा है। अदालत के इस फैसले से राजधानी ढाका समेत देश के दूसरे हिस्सों में काफी तनाव बढ़ गया है। ढाका के तोपखाना रोड और पलटन इलाके में कई जगहों पर हिंसा भी हुई है। वैसे यह सही है कि बांग्लादेश में अवामी लीग सरकार के खिलाफ भी लोगों में नाराजगी है, लेकिन कोई राजनीतिक विकल्प न होने की वजह से प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता पर फिलहाल कोई खतरा नहीं है।
अगर आप बांग्लादेश जाएं तो वहां पाएंगे कि जितने भी चौक-चौराहे हैं वहां बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के पक्ष में शायद ही कोई पोस्टर या हॉर्डिग दिखे। बांग्लादेश की राजनीति में दो बेगमों शेख हसीना और खालिदा जिया की सियासी अदावत काफी पुरानी है। बीएनपी और अवामी लीग के बीच कई मुद्दों पर गहरे मतभेद हैं। बीएनपी जहां बांग्लादेश को इस्लामिक राष्ट्र घोषित करने की मांग करती रही है वहीं अवामी लीग इसके सख्त खिलाफ रही है। उसका कहना है कि यह संविधान के खिलाफ है। खालिदा जिया जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थीं उस दौरान ईश निंदा कानून बनाने की मांग को लेकर ढाका समेत कई जिलों में भीषण हिंसा हुई थी जिसमें सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी। बीएनपी का आरोप यह भी रहा है कि अवामी लीग बांग्लादेश में हिंदू तुष्टिकरण की राजनीति करती है। साल 2014 के आम चुनाव में 18 हिंदू सांसद चुने गए थे। पिछले कई वर्षो के मुकाबले यह संख्या अधिक है। एक सरकारी आदेश के बाद पिछले दो वर्षो से बांग्लादेश के संसद में सरस्वती पूजा का भी आयोजन कराया जा रहा है। इसमें प्रधानमंत्री शेख हसीना समेत कई सांसदों और मंत्रियों ने हिस्सा लिया था। बीएनपी को हसीना सरकार का यह फैसला रास नहीं आया। नतीजतन इसके खिलाफ ढाका में कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन भी हुए। अवामी लीग सरकार हिंदुओं के कई महत्वपूर्ण त्योहारों को सरकारी अवकाश की सूची में शामिल कराया। बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी करीब बारह फीसद है जिसे अमूमन अवामी लीग का वोटबैंक समझा जाता है। यह बात सही भी है। खुद वहां रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदू स्वयं को इस सरकार में ज्यादा महफूज महसूस करते हैं।
बांग्लादेश में उर्दू भाषी मुसलमानों की संख्या करीब बीस लाख है। विभाजन के समय ये बिहार और पूर्वी उत्
तर प्रदेश से आकर बसे थे। 1971 के मुक्ति युद्ध के समय उर्दू भाषी मुसलमानों ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया था। बांग्लादेश बनने के बाद बंगाली मुसलमानों का कहर इन पर टूटा। नतीजतन इन्हें अपने घरों से बाहर आज भी कैंपों में रहना पड़ रहा है। काफी लंबी कानूनी लड़ाई के बाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद साल 2008 में इन्हें बांग्लादेशी नागिरक और वोटिंग का अधिकार मिला। उर्दू भाषी मुसलमानों को बीएनपी का सर्मथक माना जाता है। बहरहाल, बेगम खालिदा जिया को पांच साल की कैद और उनके चुनाव लड़ने पर पाबंदी के बाद इतना तय है कि दिसंबर में होने वाले चुनाव में शेख हसीना और उनकी पार्टी अवामी लीग की चुनावी राह और आसान हो गई है। भारत के लिए भी इसके काफी मायने हैं, क्योंकि अवामी लीग जब भी सत्ता में रही है दोनों देशों के संबंध काफी प्रगाढ़ हुए हैं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बहुप्रतीक्षित भूमि सीमा समझौता (एलबीए) हुआ, जिसमें दोनों देशों ने अपनी मर्जी से अपने भू-भाग का आदान-प्रदान किया था। इसके बाद दोनों देशों के करीब पचास हजार लोगों को दशकों बाद अपने देशों की नागरिकता हासिल हुई। (दैनिक जागरण से साभार )
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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*⏳ईरानी महिलाओं की हिजाब के खिलाफ साहसिक लड़ाई*⌛
*(तसलीमा नसरीन)*
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बीते 27 दिसंबर को विदा मोवाहेदी नामक 31 वर्षीय एक युवती ने तेहरान में सड़क किनारे यूटिलिटी बॉक्स पर चढ़कर एक छड़ी पर हिजाब को बांधकर झंडे की तरह लहराया था। इस विरोध के लिए उसे जेल में बंद कर दिया गया। कुछ दिन वह बाद जेल से रिहा हुई। मोवाहेदी के इस शांतिपूर्ण हिजाब विरोध के बाद ईरान में और भी कई लड़कियां और महिलाएं यूटिलिटी बॉक्स या फिर अन्य किसी ऊंचे स्थान पर चढ़कर डंडे या पेड़ की डाल में हिजाब को झंडे की तरह बांधकर लहरा रही हैं।
करीब 40 वर्षो से इस देश में महिलाओं के लिए हिजाब आवश्यक है। आप महिला हैं और घर से बाहर जाएंगी, अच्छी बात है, लेकिन आपको सिर ढककर बाहर जाना होगा। इसमें किसी तरह की कोताही नहीं होनी चाहिए। सिर के बाल से लेकर पैर के नाखून तक इस तरह ढककर रखना होगा कि कोई दूसरा व्यक्ति न देख सके। इस्लामिक नेताओं ने जब इस प्रथा की शुरुआत की थी तो इसका पूरे ईरान में व्यापक विरोध हुआ था, परंतु विरोध विफल हो गया और महिलाओं को सिर ढककर निकलने के लिए बाध्य होना पड़ा। आज सभी ईरानी लड़कियां भीड़ के बीच सड़क पर चलते हुए अचानक सिर से हिजाब नहीं हटा रही हैं, लेकिन अंदर-अंदर विरोध काफी वर्षो से चल रहा है।
2014 में मासिह एलिनेजाड नामक प्रवासी ईरानी पत्रकार ने फेसबुक पेज तैयार किया था, जिसका नाम रखा था ‘मेरी गुप्त स्वाधीनता’। उक्त पेज के जरिये उन्होंने अपील की थी कि लड़कियां ईरान के रास्ते-घाट, दुकान-बाजार, भीड़भाड़ वाले स्थानों पर खड़े होकर अपना हिजाब खोलें और फोटो खींचकर उसे उक्त& पेज पर पोस्ट करें। पिछले वर्ष मासिह एलिनेजाड ने एक और आंदोलन शुरू किया, जिसका नाम रखा ‘सफेद बुधवार’। इस बार उन्होंने महिलाओं को अनिवार्य रूप से सफेद रंग के हिजाब पहनने के कानून के खिलाफ एक आंदोलन खड़ा करने के लिए आमंत्रित किया।
संभवत: विदा मोवाहेदी और मासिह एलिनेजाड से प्रेरित होकर ही कई लड़कियों ने बुधवार 27 दिसंबर को सफेद हिजाब लहराया था। 2009 में ईरान छोड़ने से पहले मासिह एलिनेजाड पत्रकारिता करती थीं। उन्होंने बिना हिजाब के गाड़ी चलाते हुए एक फोटो भी फेसबुक पर पोस्ट की थी। उस समय उन्होंने महिलाओं से अपील की थी कि इसी तरह से वे भी अपनी फोटो फेसबुक पर पोस्ट करें। अनिवार्य हिजाब के खिलाफ आंदोलन की मुख्य बातें कुछ यूं हैं-यह हमारा शरीर है, इस शरीर को ढकने के लिए हम कैसी पोशाक पहनेंगे या नहीं पहनेंगे, यह फैसला हम स्वयं लेंगे, कोई और नहीं। हालांकि महिला आंदोलनकारी यह नहीं कह रहीं कि महिलाओं के लिए हिजाब उचित नहीं है। वे सिर्फ उसे अनिवार्य करने का विरोध कर रही हैं। उनका मानना है कि जिनकी इच्छा होगी वे हिजाब पहनेंगी और जिनकी नहीं होगी वे नहीं पहनेंगी।
यह मांग नई नहीं है, परंतु ईरान की सरकार महिलाओं को अपनी पसंद के कपड़े पहनने के अधिकार को स्वीकृति नहीं देना चाहती। दशकों पहले ईरान के सम्राट शाह पहलवी ने हिजाब को प्रतिबंधित कर दिया था। यह क्रांतिकारी कानून नहीं था, क्योंकि जो महिलाएं हिजाब के बिना बाहर नहीं जाना चाहती थीं उन्हें भी इसे मानना पड़ रहा था। वे मानती थीं कि हिजाब पहनने का उनका जो अधिकार है उसका हनन हो रहा है। कई महिलाएं इसी वजह से घरों से बाहर नहीं निकलती थीं। इसके बाद सियासी बदलाव हुआ और हिजाब को अनिवार्य कर दिया गया। ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खोमैनी ने 1979 में हिजाब को अनिवार्य किया था।
महिलाओं की पोशाक और उनके सिर के बालों को लेकर पुरुष राजनेता इतने ज्यादा चिंतित रहते हैं कि सवाल उठता है कि क्या महिलाओं का शरीर पुरुषों की संपत्ति है? अधिकांश पुरुष हमेशा से ही महिलाओं को निजी संपत्ति समझते आए हैं। आज के युग में भी इस सोच के खत्म होने का कोई लक्षण नहीं दिख रहा।11979 में हिजाब को अनिवार्य करने के खिलाफ महिलाएं सड़क पर उतरी थीं, पर जीत नही पाई थीं। हिजाब के समर्थन में लोग तब नारे लगाते थे,‘या तो हिजाब पहनो, नहीं तो मरने को तैयार रहो।’ हिजाब के कारण ईरान की ढेरों जागरूक महिलाएं गिरफ्तार हुईं और आज भी हो रही हैं। अकेले 2014 में पुलिस के पास महिलाओं के ठीक तरीके से हिजाब नहीं पहनने के 36 लाख मामले आए थे। 2006 में ईरानी नारीवादियों ने अपने समर्थन में 10 लाख हस्ताक्षर जुटाए थे और सरकार से नारी विरोधी कानूनों को निरस्त करने का अनुरोध किया था, लेकिन सरकार ने कोई कानून निरस्त नहीं किया।
उस आंदोलन के विफल होने से यही साबित हुआ कि महिलाओं की आजादी के लिए इस तरह के आंदोलन का ईरान में सफल होना संभव नहीं है। शायद इसीलिए मासिह एलिनेजाड एवं उनकी उम्र की युवतियां नए तरह का आंदोलन करना चाहती हैं। अब उन्होंने महिलाओं के सिर के हिजाब को अत्याचार के प्रतीक के तौर पर आंदोलन करने के लिए चुन लिया है। वे कहती हैं, ‘हम कपड़े के एक टुकड़े के खि
लाफ नहीं लड़ रहे हैं। हम अपने सम्मान के लिए लड़ रहे हैं। हमें अपने सिर पर क्या पहनना है, अगर यह फैसला करने नहीं दिया जाएगा तो हमारे माथे के अंदर जो बुद्धि है, उसका मालिकाना भी हमें नहीं दिया जाएगा।’
इन दिनों पूरे ईरान में हिजाब विरोधी आंदोलन चल रहा है, यह देखकर देश के राष्ट्रपति ने कहा है, ‘ठीक ही तो है, तुम अपनी पसंद-नापसंद भावी पीढ़ी पर जबरन नहीं थोप सकते।’ क्या सरकार थोड़ी नरम हो रही है? यदि नरम हो रही है तो इसका मतलब है कि महिलाओं का यह आंदोलन सफलता का मुंह देख रहा है। एलिनेजाड ने कहा है, ‘पहले महिलाएं सरकार से डरती थीं, अब सरकार महिलाओं से डर रही है।’ हो सकता है एलिनेजाड अति आशावादी हों, क्योंकि अब तक 29 महिलाओं को हिजाब विरोधी आंदोलन के अपराध में ईरानी पुलिस पकड़कर ले गई है। मुङो नहीं लगता कि ईरानी महिलाएं अपने अधिकार इतनी आसानी से पाएंगी, लेकिन वे जिस तरह के साहस का परिचय दे रही हैं वह कम नहीं है। साहस ही साहस को जन्म देता है। इससे और भी महिलाएं प्रेरित हो रही हैं और हिजाब खोलकर फेंक रही हैं।
इस आंदोलन को सिर्फईरान में नहीं, पूरी दुनिया में प्रशंसा मिली है। उन्हें यह आंदोलन जारी रखना होगा, जब तक उन्हें हिजाब नहीं पहनने का अधिकार नहीं मिल जाता। हालांकि यह नहीं हो सकता कि इस्लामिक कानून भी रहे और महिलाओं की आजादी भी। कारण यह कि दोनों परस्पर विरोधी हैं। क्या मुसलमानों के लिए इस्लाम के मानवीय पक्ष पर यकीन रखकर समाज को समता के समाज के हिसाब से गढ़ना संभव नहीं है? संभव है, बस इसके लिए महिलाओं को दासी अथवा यौन की चीज के बजाय एक संपूर्ण एवं सक्षम मनुष्य के तौर पर चिन्हित करना होगा। राष्ट्र को धर्म से अलग रखकर सभ्य कानून बहाल करके सभ्य समाज बनाने के लिए एक न एक दिन स्त्री-पुरुष, दोनों को कदम उठाने ही होंगे। बस यह यकीन बना रहे कि चाहने से सब संभव है।(दैनिक जागरण से साभार )
(लेखिका जानी-मानी साहित्यकार हैं)
*दैनिक समसामयिकी*
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*10 February 2018(Saturday)*
1.नीति आयोग ने विश्व बैंक और स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर स्वास्थ्य सूचकांक तैयार किया
• नीति आयोग ने विश्व बैंक और स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर स्वास्थ्य सूचकांक तैयार किया है जिसे आज जारी किया गया।
• सूचकांक में बड़े राज्यों में 76.55 अंक के साथ केरल पहले और 33.69 अंक के साथ उत्तर प्रदेश अंतिम स्थान पर है। दिल्ली 50.00 अंक के साथ तीसरे स्थान पर रहा।
• छोटे राज्यों में मिजोरम 73.70 अंक के साथ पहले और नगालैंड 37.38 अंक के साथ आखिरी स्थान पर तथा केंद्रशासित प्रदेशों में 65.79 अंक के साथ लक्षद्वीप शीर्ष पर और दादर एवं नागर हवेली 34.64 अंक के साथ सबसे नीचे है।
• सूचकांक तय करने के लिए राज्यों का आकलन बाल मृत्यु दर, पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर, टीकाकरण की व्यापकता, घर की बजाय अस्पतालों में बच्चों का जन्म तथा एचआईवी के रोगियों की संख्या आदि को आधार बनाया गया है।
• सालाना वृद्धिकारी निष्पादन के लिहाज से झारखंड, जम्मू- कश्मीर व उत्तर प्रदेश शीर्ष के तीन राज्यों मंअ से हैं। इन राज्यों ने नवजात मृत्यु दर, पांच साल से कम के शिशुओं की मृत्यु दर, पूर्ण टीकाकरण तथा संस्थागत प्रसव के मामले में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया।
• नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत ने यह रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, सरकारी शोध संस्थान का मानना है कि स्वास्थ्य सूचकांक सरकार व सहकारिता संघवाद के इस्तेमाल के उपकरण के रूप में काम करेगा। छोटे राज्यों में रैंकिंग के मामले में मणिपुर दूसरे और मेघालय तीसरे स्थान पर हैं। वहीं सुधार के मामले में मणिपुर पहले, गोवा दूसरे और मेघालय तीसरे स्थान पर है।
• केंद्र शासित प्रदेशों में लक्षद्वीप के बाद चंडीगढ़ दूसरे और दिल्ली तीसरे स्थान पर है। सुधार के मामले में भी लक्षद्वीप पहले, अंडमान निकोबार दूसरे और दादर एवं नागर हवेली तीसरे स्थान पर हैं।
• रिपोर्ट में कहा गया है हालांकि भारत ने जीवन प्रत्याशा बढ़ाने और शिशु एवं मातृ मृत्यु दर कम करने के मामले में काफी प्रगति की है लेकिन एक राष्ट्र के रूप में सुधार की हमारी दर अपर्याप्त है।
• नीति आयोग ने कहा है कि उसका फोकस बदलाव को गति देने और उन राज्यों को रेखांकित करना है जिन्होंने सबसे ज्यादा सुधार किया है।
• सुधार का आकलन वर्ष 2014-15 की तुलना में 2015-16 के प्रदर्शन से किया गया है। यह रिपोर्ट स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ मिलकर तैयार की गयी है।
2. मालदीव को लेकर भारत से विवाद नहीं चाहता चीन
• मालदीव में जारी राजनीतिक उथल-पुथल के समाधान का रास्ता निकालने के लिए चीन निरंतर भारत के संपर्क में है। चीन का कहना है कि वह नहीं चाहता कि यह मुद्दा भारत के साथ उसके संबंधों में विवाद का एक और विषय बने।
• अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच टेलीफोन पर लंबी बातचीत और मालदीव में विशेष भारतीय सुरक्षा बलों की तैनाती की खबरों के बीच चीन का कहना है कि मालदीव में कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
• चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने शुक्रवार को कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मालदीव की संप्रभुता और स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। मालदीव की वर्तमान स्थिति उनका आंतरिक मामला है। सभी संबंधित पक्षों को इसका आपसी बातचीत व सलाह-मशविरे से समाधान करना चाहिए।
• मालदीव के आर्थिक विकास मंत्री मोहम्मद सईद और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच मुलाकात का जिक्र करते हुए शुआंग ने कहा कि चीन ने मालदीव के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने का भरोसा दिया है। जब उनसे पूछा गया कि मालदीव अपनी समस्या का समाधान अकेले कैसे कर पाएगा जबकि यामीन सरकार ने शीर्ष न्यायाधीशों और नेताओं को ही बंदी बना लिया है। इस पर चीनी प्रवक्ता ने कहा कि यह सवाल तो मालदीव सरकार से पूछा जाना चाहिए।
• क्या मोहम्मद सईद ने चीन से मदद मांगी है? इस पर शुआंग ने कहा कि दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध बिल्कुल ठीक हैं और दोनों के बीच सामान्य व दोस्ताना बातचीत होती है।
• मालूम हो कि डोकलाम में तनातनी और मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने की राह में बीजिंग के रोड़ा अटकाने की वजह से भारत-चीन संबंधों में पहले से ही खटास है।
3. सुरक्षा व आर्थिक संबंध बढ़ाएंगे मोदी-ट्रंप
• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सुरक्षा और आर्थिक सहयोग को मजबूत करने के साथ ही हिंद-प्रशांत में साझेदारी को लेकर प्रतिबद्धता जताई है।
• व्हाइट हाउस से जारी बयान के मुताबिक, ‘‘द्विपक्षीय सहयोग पर बृहस्पतिवार को टेलीफोन वार्ता के दौरान, दोनों नेताओं ने रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण और विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की क्रमश: अमेरिकी रक्षामंत्री जिम मैटिस और व
िदेशमंत्री रेक्स टिलरसन के साथ टू प्लस टू स्तर की बैठक के बारे में र्चचा की।’
• बयान के अनुसार, ‘‘दोनों नेताओं ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा और समृद्धि बढ़ाने के लिए लगातार सुरक्षा और समृद्धि बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई।’
• राष्ट्रपति ट्रंप की दक्षिण एशिया नीति की पुष्टि करते हुए उन लोगों ने अफगानिस्तान में सुरक्षा और स्थिरता के लिए समर्थन की प्रतिबद्धता दोहराई।’ दोनों नेताओं ने मालदीव में राजनीतिक संकट पर भी चिंता जताई और लोकतांत्रिक संस्थान व कानून के शासन के आदर की महत्ता पर जोर दिया। ‘‘दोनों नेताओं ने म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थियों के संकट को सुलझाने के तरीकों और देश की स्थिति पर भी बात की।’
• अमेरिकी विदेश नीति की शीर्ष प्राथमिकता, उत्तर कोरिया के मुद्दे पर भी दोनों नेताओं ने प्योंगयांग के परमाणु निशस्त्रीकरण के लिए अन्य कदम उठाने के बारे में र्चचा की।’
• चीन मालदीव में उपजे राजनीतिक संकट के बीच वहां के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन को समर्थन दे रहा है, वहीं नई दिल्ली और वाशिंगटन इस मुद्दे पर समान दृष्टिकोण अपना रहे हैं और दोनों देश यामीन द्वारा सोमवार को लागू आपातकाल को समाप्त करने व वहां लोकतंत्र की तत्काल बहाली चाहते हैं।
4. मूडीज ने दो बैंकों की रेटिंग बढ़ाई
• अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज ने शुक्रवार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों सेंट्रल बैंक आफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक (आईओबी) के लिए परिदृश्य को स्थिर से बढ़ाकर सकरात्मक कर दिया है। सरकार की ओर से बैंकों में पूंजी डालने के कारण रैकिंग में सुधार किया गया है।
• एजेंसी ने दोनों बैंकों की दीर्घकालिक स्थानीय तथा विदेशी मुद्रा जमा की रेंिटंग को बीए3 पर रखने की पुष्टि की। एजेंसी ने बैंकों के कर्ज आकलन (बीसीए) को बी3 पर और उसके प्रतिपक्ष जोखिम आकलन (सीआरए) ने बीए2 (सीआर) एनपी(सीआर) पर रखा है।
• सरकार के पुनर्पूंजीकरण योजना के तहत सेंट्रल बैंक को 5160 करोड़ रपए जबकि इंडियन ओवरसीज बैंक को 4,690 करोड़ रूपये की नई पूंजी सरकार से मिलेगी।
• मूडीज ने रिपोर्ट में कहा, सकरात्मक परिदृश्य यह दर्शाता है कि सरकार की ओर से अगले 12 से 18 महीने में डाली जाने वाली पूंजी के कारण बैंकों की पूंजीगत स्थिति में सुधार जारी रहेगा।
5. विदेशी मुद्रा भंडार रिकार्ड 420 अरब डालर के पार
• देश के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार आठवें सप्ताह वृद्धि दर्ज हुई है। दो फरवरी को समाप्त सप्ताह में यह 421.91 अरब डालर के अब तक के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया।यह पहली बार है जब विदेशी मुद्रा भंडार 420 अरब डालर के पार पहुंचा है।
• इससे पहले 26 जनवरी को समाप्त सप्ताह में यह तीन अरब डालर बढ़कर 417.79 अरब डालर पर रहा था। बीते सप्ताह में इसमें 4.13 अरब डालर की वृद्धि हुई जो दो महीने की सबसे बड़ी वृद्धि है।
• गत दो फरवरी को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने का प्रमुख कारण इसके सबसे बड़े घटक विदेशी मुद्रा परिसंपत्ति का 3.03 अरब डालर बढ़कर 396.77 अरब डालर पर पहुंचना रहा है।
• इसके साथ ही देश का स्वर्ण भंडार भी 1.09 अरब डालर की मजबूत बढ़ोतरी के साथ 21.51 अरब डालर के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया। आलोच्य सप्ताह में आईएमएफ के पास आरक्षित निधि बढ़कर 2.08 अरब डालर रही।
6. आयुष्मान भारत के लिए पहले साल 12 हजार करोड़
• 10 करोड़ परिवारों को पांच लाख रुपये का बीमा देने के लिए केंद्र सरकार को पहले साल 12 हजार करोड़ रुपये और दूसरे साल 22 हजार करोड़ रुपये का प्रीमियम देना होगा। प्रति परिवार को 1180 रुपये वार्षिक का प्रीमियम का अनुमान लगाया है।
• स्वास्थ्य सुरक्षा योजना में पहले साल सभी बीमारियों को नहीं जोड़ा जाएगा, लेकिन अगले साल योजना की समीक्षा कर उसका दायरा बढ़ाया जाएगा।बजट में घोषित आयुष्मान भारत योजना के तहत 10 करोड़ लोगों को पांच लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा दिया जाएगा। बजट में केवल दो हजार रुपये का प्रावधान किया गया है। योजना की विस्तृत रिपोर्ट नीति आयोग तैयार कर रहा है।
• नीति आयोग सूत्रों के अनुसार पहले साल करीब 1180 रुपये प्रति परिवार का प्रीमियम का खर्चा आयेगा। राजस्थान सरकार ने 350 रुपये के प्रीमियम में तीन लाख रुपये का बीमा उपलब्ध कराया है। अब यह प्रीमियम बढ़कर करीब 1200 रुपये हो गया है। पश्चिम बंगाल सरकार भी पांच रुपये का बीमा दे रही है।
• केंद्र सरकार ने पहले साल 10 करोड़ परिवारों का अनुमान लगया है कि लेकिन इसमें बढ़ोतरी होगी। क्योंकि बहुत से परिवार ऐसे हैं जो बीपीएल की श्रेणी मे नहीं आते हैं, लेकिन उनकी स्थिति बीपीएल के अच्छी नहीं है। आयोग का कहना है कि बीमाधारकों की संख्या करोड़ों में होने के कारण सरकार के पास बीमा कंपनियों और अस्पतालों के साथ बार्गेन करने की ताकत होगी।
• पहले चरण में बीमा कवरेज में सभी बीमारियों को शामिल नहीं किया जाएगा। पहले चरण के अनुभव के आधार पर दूसरे
चरण में बीमारियों की संख्या जोड़ी जाएगी। सरकार बीमारियों के हिसाब उनके रेट भी तय करेगी।
• सूत्रों का कहना है स्वास्थ्य सुरक्षा योजना का खर्च केंद्र सरकार और राज्यों के बीच 60:40 के अनुपात में उठाएगी। यदि कोई राज्य अपनी ही बीमा योजना चलाना चाहे तो वह स्वतंत्र होगा, जैसे कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और राजस्थान चला रहे हैं।
7. सुप्रीम कोर्ट ने दी देश में 19 ट्रिब्यूनल की नियुक्ति को हरी झंडी
• सुप्रीम कोर्ट ने कैट और एनजीटी सहित सभी 19 टिब्यूनल के अध्यक्ष, न्यायिक एवं अन्य सदस्यों की नियुक्ति का रास्ता साफ कर दिया। 2017 के वित्त अधिनियम और पैनल को प्रशासित करने वाले नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं के लंबित रहने के कारण नियुक्ति रुकी हुई थी।
• मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा शुक्रवार को दिए गए आदेश में टिब्यूनल पर नए कानून एवं नियमों पर रोक लगाई गई है।
• पीठ ने कहा है कि केंद्रीय प्रशासनिक टिब्यूनल (कैट), नेशनल ग्रीन टिब्यूनल (एनजीटी) और सशस्त्र बल टिब्यूनल (एएफटी) जैसे टिब्यूनल में पुराने नियमों में कुछ संशोधन के तहत नियुक्ति की जा सकेगी।
• लोगों के प्रदर्शन के अधिकार पर समग्र दृष्टि की जरूरत : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नागरिकों के प्रदर्शन के बुनियादी अधिकार के संरक्षण पर एक समग्र दृष्टि अपनाने की जरूरत है। दिल्ली में प्रदर्शन के लिए स्थान तय करने के मुद्दे पर शीर्ष अदालत ने सुनवाई की।
• पीठ ने कहा कि पर्यावरण और नियमित रूप से आने-जाने वाले लोगों के अधिकार के संरक्षण की भी जरूरत है। केंद्र सरकार ने शुक्रवार को शीर्ष अदालत से कुछ समय देने की मांग की।
8. पश्चिम बंगाल में आठवीं सरकारी भाषा बनी ‘कुरुख’
• पश्चिम बंगाल में आठवीं सरकारी भाषा के रूप में ‘कुरुख’ को स्वीकृति दे दी गई है। इसके लिए बंगाल भाषा कानून में संशोधन किया गया है। मुख्य रूप से उरांव और किशान संप्रदाय के लोग यह भाषा बोलते हैं।
• बंगाल में बांग्ला के अलावा उर्दू, हिंदी , नेपाली, सांउताली, ओडिया, अलचिकी और पंजाबी को सरकारी भाषा के रूप में मान्यता है। बंगाल के कुछ भागों में ‘कुरुख’ भाषा का प्रचलन है। ओडिशा, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, नेपाल व भूटान में भी इस भाषा को बोलने वाले लोग हैं।
• बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में भी लोग इस भाषा का प्रयोग करते हैं। बंगाल में करीब 16 लाख लोग ‘कुरुख’ भाषा बोलते हैं। पिछले वर्ष फरवरी में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘कुरुख’ को सरकारी भाषा के रूप में मान्यता देने की घोषणा की थी।
• उल्लेखनीय है कि बिहार की भोजपुरी और मैथिली भाषा को भी सरकारी भाषा की सूची में स्थान दिलाने की लंबे समय से मांग की जा रही है। इसे लेकर दलों और उनके नेताओं ने संसद के दोनों सदनों में तमाम बार आवाज उठाई है। पूर्ववर्ती सरकारों की ओर से समय-समय पर आश्वासन भी दिया गया लेकिन अभी तक कुछ ठोस नहीं किया गया है।
9. ‘‘जूनो’ ने बृहस्पति की 10वीं परिक्रमा पूरी की
• अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने कहा है कि अंतरिक्ष यान ‘‘जूनो’ ने बृहस्पति ग्रह की कक्षा में करीब से यात्रा करते हुए इस सप्ताह अपनी 10वीं परिक्रमा पूरी कर ली है।
• नासा ने बृहस्पतिवार को एक बयान में कहा कि जूनो सात फरवरी को प्रशांत महासागर के मानक समय अनुसार सात फरवरी को सुबह 6.36 बजे बृहस्पति के सबसे करीब था। बयान के अनुसार, परिक्रमा के दौरान जानकारी इकट्ठी कर रहा जूनो अब धरती पर लौट रहा है।
• पांच अगस्त, 2011 को प्रक्षेपित जूनो ने हाल ही में बृहस्पति के प्रसिद्ध तूफान ‘‘द ग्रेट रेड स्पॉट’ की गहराई का पता लगाया था। अंतरिक्ष यान चार जुलाई, 2016 को बृहस्पति की कक्षा में पहुंच गया था। अनुसंधान के समय जूनो बृहस्पति की धरती से लगभग 3400 किलोमीटर ऊपर बादलों के बराबर पहुंच गया था।
• जूनो परिक्रमा के दौरान बृहस्पति के चारों तरफ निर्मित बादलों के धुंधले आवरण के नीचे के वातावरण, ग्रह की उत्पत्ति, बनावट, वातावरण और उसके चुम्बकत्व के बारे में और अधिक जानने के लिए उसके सूर्योदय का अध्ययन कर रहा था।
10. आईसीसी की पहली महिला स्वतंत्र निदेशक होंगी नूयी
• पेप्सीको की चेयरमैन और सीईओ इंदिरा नूयी को आईसीसी की पहली स्वतंत्र महिला निदेशक नियुक्त किया गया। नूयी जून 2018 में बोर्ड से जुड़ेंगी।
• आईसीसी ने कहा, ‘‘इस भूमिका के लिए आईसीसी से जुड़ने वाली पहली महिला बनकर मैं रोमांचित हूं। बोर्ड, आईसीसी साझेदारों और क्रि केटरों के साथ काम करने का मुझे इंतजार है।’
• आईसीसी अध्यक्ष शशांक मनोहर ने कहा, ‘‘एक और स्वतंत्र निदेशक और वह भी महिला को नियुक्त करना देश के संचालन को बेहतर बनाने की दिशा में अहम कदम है।’ उनकी नियुक्ति दो साल के लिए की गई है लेकिन उन्हें दोबारा नियुक्त किया जा सकता है।
Source of the News
Dainik Bhaskar(Rashtriya Sanskaran), Rashtriya Sahara(Rashtriya Sanskaran) Hindustan dainik(Delhi), Nai Duniya, Hindustan Times, The Hindu, BBC Portal, The Economic Times(Hindi& English)

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